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ब्रह्माकुमारीज़ में राजस्थान सरकार के अधिकारियों ने सीखी कचरा प्रबंधन की विधि

ब्रह्माकुमारीज़ में राजस्थान सरकार के अधिकारियों ने सीखी कचरा प्रबंधन की विधि

– संस्थान ने सोलार थर्मल पावर प्लांट में स्थापित किया है ठोस अपशिष्ट प्रबंधन संयंत्र

– गीले कचरे से हर माह बनाया जाता है डेढ़ लाख लीटर जैविक खाद

– रोजाना 200 यूनिट बिजली का होता है उत्पादन

आबूरोड, राजस्थान। राजस्थान सरकार के जोधपुर संभाग के स्वायत्त विभाग के 65 अधिकारियों का दल ब्रह्माकुमारीज़ मुख्यालय में कचरा प्रबंधन के गुर सीखने के लिए पहुंचा। इसे लेकर सोलार थर्मल पावर प्लांट के ठोस अपशिष्ट प्रबंधन संयंत्र में प्रायोगिक तौर पर प्रशिक्षण दिया गया। इस दो दिवसीय आवासीय कार्यशाला में अधिकारियों ने कचरा कलेक्शन से लेकर उसके मैनेजमेंट और गीले कचरे से खाद बनाने की विधि को बारीकी से समझा।

बता दें कि ब्रह्माकुमारीज़ संस्थान के सभी परिसरों से निकलने वाले गीले कचरे को रिसाइकिल कर बिजली और जैविक खाद का उत्पादन किया जा रहा है। इससे जहां हर माह छह हजार यूनिट बिजली मिल रही है, वहीं हर माह एक से डेढ़ लाख लीटर जैविक खाद का उत्पादन हो रहा है। इसका उपयोग सब्जी-फसल उत्पादन और बागवानी में किया जाता है। सोलार प्लांट के इंजीनियर्स की टीम से इसे आकार दिया है।

इन परिसरों से लाते हैं कचरा-
ब्रह्माकुमारीज़ संस्थान के आबू रोड स्थित मुख्यालय शांतिवन परिसर, आनंद सरोवर, ज्ञान सरोवर, तपोवन, मनमोहिनीवन, वहीं माउंट आबू स्थित पांडव भवन, ज्ञान सरोवर सहित छोटे-बड़े 12 परिसरों में से निकलने वाले कचरे को चार कचरा वाहनों की मदद से प्लांट लाया जाता है। जहां सूखे और गीले कचरे को अलग-अलग स्टोरेज किया जाता है। सूखे कचरे को अलग कर लिया जाता है।

ऐसे तैयार होता है लिक्विड खाद-
गीले कचरे को मशीन से छोटे-छोटे क्रिस्टल में कटिंग की जाती है। फिर मिक्सर से जूस की तरह पीसकर तरल घोल तैयार किया जाता है। फिर इसे डाइजेस्टर टैंक में डाला जाता है। जिससे 250-350 क्यूबिक बायोगैस बनती है। बायोगैस को जनरेटर से बिजली में बदला जाता है। रोजाना तीन हजार से चार हजार लीटर लिक्विड खाद निकलती है। बाजार में यह लिक्विड खाद एक रुपए लीटर के हिसाब से मिलती है।

रोजाना चार हजार लीटर खाद का निर्माण-
इस संयंत्र से रोजाना चार हजार लीटर तरल जैविक खाद का निर्माण होता है। इसे हम खेतों में सीधे तौर पर या पानी में मिलाकर सिंचाई कर सकते हैं। पूरे संयंत्र में सात से आठ लोगों की टीम कार्य करती है। इस संयंत्र की सबसे बड़ी विशेषता है कि इसमें गार्डन, पार्क से निकलने वाली घास और पत्तों के कचरे को भी उपयोग में लाया जाता है। इन पत्तों और घास को अन्य गीले कचरे के साथ ग्राउंड करके लिक्विड तैयार किया जाता है।

32 हजार लोगों की कैपेसिटी से किया गया है डिजाइन-

ठोस अपशिष्ट प्रबंधन संयंत्र के बीके योगेंद्र भाई ने बताया कि इस संयंत्र को इस हिसाब से डिजाइन किया गया है कि 32 हजार लोगों के लिए बनने वाले भोजन से निकलने वाला गीला कचरा (फल, सब्जी का अपशिष्ट) एक दिन में यहां रिसाइकिल किया जा सकता है। संयंत्र में तीन से साढ़े तीन टन गीले कचरे को रोजाना रिसाइकिल करने की क्षमता है। सूखे कचरे में शामिल पेपर, ग्लास, प्लास्टिक, बॉटल आदि को मशीन से अलग किया जाता है।

प्रशिक्षण में आए अधिकारी बोले-

– डायरेक्टोरेट ऑफ लोकल बॉडीज के असिस्टेंट इंजीनियर डॉ. गौरव सिंह ने कहा कि यहां जो गीले कचरे से खाद बनाई जा रही है यह अच्छा इनीएशिएटिव प्रोजेक्ट है। इसे अन्य लोगों को भी अपनाना चाहिए। यहां बेहतर तरीके से कचरे को मैनेज किया जा रहा है।

जोधपुर के अन्नति आर्गनाइजेशन के डॉ. शिशिर पुरोहित ने कहा कि यहां बहुत ही साइंटिफिक तरीके से कचरे को मैनेज किया जा रहा है। यहां आकर हमारी टीम को बहुत कुछ सीखने को मिला है।

आबूरोड नगर पालिका के स्वच्छ भारत मिशन के इंजीनियर सचिन कुमार ने कहा कि यहां गीले कचरे का बहुत ही बढ़िया तरीके से प्रबंधन किया जा रहा है।

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