छत्तीसगढ़

सहानुभूति के साथ पालन-पोषण बच्चों के उज्जवल भविष्य की मजबूत नींव…ब्रह्माकुमारी सविता दीदी

– भावनात्मक समझ और संवाद से बनता है भरोसेमंद रिश्ता…

– बच्चों को अच्छी शिक्षा के साथ-साथ अच्छे पारिवारिक माहौल की जरूरत…ब्रह्माकुमारी सविता दीदी

– सहानुभूति के साथ पालन-पोषण बच्चों के उज्जवल भविष्य की मजबूत नींव…

रायपुर, 3 मई 2026: प्रजापिता ब्रह्माकुमारी ईश्वरीय विश्व विद्यालय द्वारा नवा रायपुर के सेक्टर-20 स्थित एकेडमी फॉर ए पीसफुल वर्ल्ड-शान्ति शिखर में आयोजित प्रेरणा समर कैम्प के दूसरे दिन बच्चों के अभिभावकों के लिए सहानुभूति के साथ बच्चों का पालन-पोषण (Parenting with Empathy) विषय पर कार्यक्रम रखा किया।

इस अवसर पर बोलते हुए ब्रह्माकुमारी सविता दीदी ने कहा कि बच्चों को अच्छी शिक्षा के साथ-साथ अच्छे पारिवारिक माहौल की भी आवश्यकता होती है। आज के तेज़ रफ्तार और प्रतिस्पर्धात्मक दौर में बच्चों का पालन केवल उनकी शारीरिक जरूरतों को पूरा करने तक सीमित नहीं रह गया है। अब माता-पिता के लिए यह आवश्यक हो गया है कि वे बच्चों की भावनाओं, विचारों और मनोस्थिति को भी समझें।

उन्होंने कहा कि माता-पिता को अब बच्चों की भावनाओं को समझने और उनका सम्मान करने की जरूरत है। जब माता-पिता बच्चों के व्यवहार के पीछे छिपी भावनाओं को समझने की कोशिश करते हैं तो वे उनके साथ एक गहरा और भरोसेमंद रिश्ता बना पाते हैं। इससे आपका बच्चा स्वयं को सुरक्षित, सम्मानित और आत्मविश्वास से भरपूर महसूस करेगा। यह एक सोच है जो बच्चों के संपूर्ण विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। यह न केवल बच्चों के व्यक्तित्व को निखारता है बल्कि परिवार और समाज को भी अधिक संवेदनशील और मजबूत बनाएगा।

सहानुभूति क्यों जरूरी है? इस बात की चर्चा करते हुए उन्होंने बतलाया कि जिन बच्चों को बचपन में माता-पिता से भावनात्मक समर्थन और समझ मिलती है वे आगे चलकर बेहतर निर्णय लेने वाले, संवेदनशील और मानसिक रूप से मजबूत व्यक्ति बनते हैं। इसके विपरीत, कठोर या उपेक्षापूर्ण व्यवहार बच्चों में डर, असुरक्षा और आक्रोश पैदा कर सकता है। कई बार माता-पिता अपने तनाव, समय की कमी या सामाजिक दबाव के कारण कठिनाई महसूस करते हैं। ऐसे में जरूरी है कि वे खुद के मानसिक स्वास्थ्य का ध्यान रखें और जरूरत पडऩे पर विशेषज्ञों की सलाह लें।

ब्रह्माकुमारी रश्मि दीदी ने सलाह देते हुए कहा कि हरेक माता-पिता को अपने बच्चों की बातों को ध्यान से सुनना चाहिए। बच्चे की भावनाओं को सही या गलत ठहराने के बजाय उन्हें समझने का प्रयास करें। उसके बाद धैर्य और संयम से शांत रहकर अपनी प्रतिक्रिया देनी चाहिए। बच्चों से खुलकर बातचीत करें और उनकी समस्याओं को समझने का प्रयास करें। अनुशासन सिखाने और डांट-फटकार की जगह समझाने और उचित मार्गदर्शन का तरीका अपनाएं। यदि परिवारों में सहानुभूतिपूर्ण वातावरण विकसित होता है तो इसका सकारात्मक प्रभाव बच्चों पर पड़ता है। ऐसे बच्चे बड़े होकर अधिक जिम्मेदार, सहिष्णु और सहयोगी नागरिक बनते हैं।

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