परंपरा से खिलवाड़ का ‘अदृश्य’ न्याय? जानिए क्यों जामड़ीपाठ के बुजुर्ग ग्रामीणों ने कहा— “नाखुश हैं हमारे प्राकृतिक देवी-देवता

छत्तीसगढ़ के बालोद जिले में स्थित तुएगोंडी-पाटेश्वर धाम (जामड़ीपाठ क्षेत्र) का विवाद जितना बाहर से सीधा दिखाई देता है, जमीन पर इसकी परतें उतनी ही गहरी हैं। मीडिया और सोशल मीडिया पर इसे ‘आदिवासी बनाम बाहरी निर्माण’ का रंग देकर उग्र आंदोलन का रूप दिया जा रहा है। लेकिन जब हम इस आंदोलन की परतों को हटाकर स्थानीय वास्तविकताओं को टटोलते हैं, तो एक बिल्कुल अलग और चौंकाने वाला सच सामने आता है। यह विवाद मुख्य रूप से आदिवासी समाज के भीतर का आंतरिक मतभेद और मासूम परंपराओं के राजनैतिक हाईजैकिंग का मामला है, जिसे कुछ स्वयंभू नेता हवा दे रहे हैं।
बाहर से आकर प्रदर्शन कर रहे ‘सर्व आदिवासी समाज’ और कुछ कथित रसूखदार नेताओं के दावों के विपरीत, जमीनी हकीकत यह है कि इस क्षेत्र के 12 में से 11 गांवों के स्थानीय आदिवासी और ग्रामीण इस आंदोलन के साथ बिल्कुल नहीं हैं। तोयगोंडी के स्थानीय आदिवासियों के एक छोटे से वर्ग को मोहरा बनाकर, इन बाहरी संगठनों ने पूरे क्षेत्र की शांति को दांव पर लगा दिया है। ये अलगाववादी नेता स्थानीय स्तर पर पीढ़ियों से चले आ रहे परंपरागत मुखियाओं (गांयता, बैगा और सियान) की आवाज को दबा रहे हैं और अपनी तेज आवाज व राजनीतिक रसूख के दम पर सीधे-सादे ग्रामीणों के बीच फूट डालने की कोशिश कर रहे हैं।
आंदोलनकारियों द्वारा सबसे बड़ा ‘इमोशनल कार्ड’ यह खेला जा रहा है कि आदिवासियों के प्राचीन देवस्थल को नुकसान पहुंचाया गया है। जबकि सच यह है कि जिस मूर्ति को हटाने या विसर्जित करने को लेकर इतना बड़ा बखेड़ा खड़ा किया गया, उसे श्रद्धापूर्वक स्थापित करने वाले भी इसी स्थानीय समाज के आदिवासी ही थे और वह मूर्ति भी आदिवासियों के ही आराध्य देव की है। ऐसे में इसे ‘आदिवासी संस्कृति पर कोई बाहरी हमला’ बताना पूरी तरह से अतार्किक, भ्रामक और राजनीतिक रूप से प्रायोजित है।
सांस्कृतिक घालमेल: रूढ़ि-परंपरा के नाम पर ‘नए देवताओं और प्रतीकों’ को थोपने का खेल
स्थानीय बुजुर्गों और गोंड संस्कृति के जानकारों का मानना है कि ‘गोंडवाना’ और ‘सर्व आदिवासी समाज’ के कुछ नए नेता अपनी राजनीतिक जमीन मजबूत करने के लिए एक नई और मनगढ़ंत संस्कृति गढ़ रहे हैं:
• ऐतिहासिक सच: परंपरा से ही, गोंड राजाओं के समय से और पुराने तीर्थ स्थानों में हजारों साल से सभी देवी-देवताओं की मूर्तियां स्थापित रही हैं।
• पारंपरिक जुड़ाव: ‘गौरी-गौरा’ (शिव-पार्वती विवाह) का पावन त्योहार खुद गोंड समाज ही सदियों से पूरी श्रद्धा के साथ मनाता आया है।
• सांस्कृतिक प्रहार: लेकिन आज इन ऐतिहासिक तथ्यों को नकारकर, ‘सेवा-सेवा’ के नए नारों और शिवलिंग के नए स्वरूपों को जबरन थोपा जा रहा है, ताकि पारंपरिक गोंड संस्कृति के मूल स्वरूप को बदलकर उसे व्यापक समाज से काटा जा सके।
गोंड संस्कृति का मूल आधार अत्यंत पावन, प्रकृति-पूजक और सात्विक रहा है, जिसका आज राजनैतिक दुरुपयोग हो रहा है। स्थानीय जनजातीय समाज का मानना है कि इस राजनैतिक कोलाहल और ढोंग से उनके प्राकृतिक देवी-देवता भी अत्यंत नाखुश हैं, जिसका सीधा प्रमाण हाल ही में आंदोलनकारियों पर हुआ मधुमक्खियों का तेज हमला है।
हमारी मूल परंपरा मानती है कि:
• बलि का निषेध: गोंड प्रथा में मनमाने ढंग से दी जाने वाली बलि प्रथा का हमेशा से निषेध रहा है। जल जीवन का आधार है, इसलिए जल स्रोतों को पवित्र रखने के लिए उसमें कभी भी खून नहीं डाला जाता।
• देवस्थलों का मौन: आदिवासियों के पारंपरिक देवस्थल हमेशा गांव से दूर, एकांत और शांत स्थानों पर होते हैं ताकि वहां की आध्यात्मिक ऊर्जा बनी रहे, न कि वहां लाउडस्पीकर बजाकर राजनीति की जाए।
• आस्था का स्वांग: ‘देव आने’ की अवस्था अत्यंत पवित्र और निष्पाप रूप में होती है, लेकिन अलगाववादी नेता आंदोलनों में इसका राजनैतिक स्वांग रचकर इस श्रद्धेय परंपरा को कलंकित और बदनाम कर रहे हैं।
इन सभी 12 गांवों की बनावट बेहद खूबसूरत और समावेशी है। यहाँ केवल आदिवासी ही नहीं, बल्कि बड़ी संख्या में गैर-आदिवासी समाज के लोग भी पीढ़ियों से रहते आए हैं। सदियों से सभी वर्ग यहां मिल-जुल कर, एक-दूसरे के तीज-त्योहारों और सुख-दुख में शामिल होते आए हैं। स्थानीय ग्रामीण आज भी इसी आपसी भाईचारे और शांति के साथ रहना चाहते हैं, लेकिन राजनैतिक रोटियां सेकने वाले मुट्ठी भर अलगाववादी लोग इस सुंदर सामाजिक ताने-बाने को छिन्न-भिन्न करने पर तुले हुए हैं।
यह विवाद जमीन के एक टुकड़े से कहीं ज्यादा आदिवासी समाज की मूल, सौम्य और समावेशी संस्कृति को राजनीतिक हाईजैकिंग से बचाने का है। जरूरत इस बात की है कि बाहरी हस्तक्षेप को पूरी तरह दरकिनार कर, स्थानीय 12 गांवों के परंपरागत मुखियाओं और बुजुर्गों की बात सुनी जाए, ताकि प्रकृति, परंपरा और सामाजिक समरसता को इस अलगाववादी आग से सुरक्षित बचाया जा सके।



